इस 'हम' से बडा तो कोई वहम नहीं है।
अकेले आकर अकेले जाते हैं लोग।
फिर भी 'हम' होने का अहम पालते हैं लोग ।।
अमीरों को बड़प्पन का अहम है।
गरीबों को फूटी किस्मत का वहम है।
जिनमे समझदारी की सौगात है।
उन्हें दोनों की नासमझी पर रहम है ।
ताकतवर अहम में हाथ उठा जाते हैं।
कमजोर वहम में मैदान छोड़ जाते हैं।
हिम्मतवालों में जो होते हैं,
दोनों की बुज़दिली पर सहम जाते हैं।
हम में न तो अहम है, न ही वहम है,
ये सोच रखना भी तो एक अहम है।
हैं सही हर मायने में सिर्फ हम ही,
ये मानने से भी बड़ा क्या कोई वहम है?


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