Sunday, September 14, 2014

मित्रों त्योहारों का मौसम आ गया है। गणेशोत्सव हो गया है, कई और त्यौहार आने बाकि हैं। इन्हे मनाने के लिए कई संस्थाओं के लोग हमसे चंदा मांगने आयंगे। मेरी विनती है की उस समय हम सब चंदे के राशि का उपयोग या दुरुपयोग न सोचते हुए दिल खोल कर चंदा दें। हो सके तो जितने वे मांगे उससे ज्यादा। साल में एक बार ही देना पड़ता है और उतने पैसे तो हम बेवकूफी भरी चीज़ों पर, मॉल में घूमने में, महंगे लंच और डिनर पर, फ़िल्में देखने में अनायास ही खर्च कर देते हैं।

ये त्यौहार और उत्सव ही हमारे धर्मे और संस्कृति की धुरी हैं और उसकी व्यवस्था करने वाले ये लोग धर्म के अग्रणी सैनिक । जुलूसों और झांकियों में शराब पीकर नाचते हुए युवक भी हमारी पताका फहराने का अप्रितम काम करते हैं जो हम और आप नहीं कर सकते। याद रखें जब राजपूत जौहर करने निलकते थे तब उन्हें भी अफीम खिलाई जाती थी और आज भी सीमा पर लड़ने वाले सैनिकों को शराब मुहैय्या करायी जाती है ताकि वे असाधारण ऊर्जा एवं साहस का संचय कर सकें।

वक्त और ज़रूरत पड़ने पर यही लोग सर्वप्रथम देश और धर्म के काम आते रहे हैं और आगे भी आएंगे। वे यदि थोड़ा फिजूलखर्च करते हों या चंदे की राशि का एक भाग स्वयं पर खाने पीने में व्यय करते हों तो भी उसे नज़रअंदाज़ कर दें। इतनी बड़ी व्यवस्था बनाये रखने में इनके योगदान की उसे दक्षिणा समझें और भरघोष चंदा दे सभी उत्सवों को सफल बनायें।
  • लोग वहम में रहते हैं की हमें कोई अहम नहीं है।
    इस 'हम' से बडा तो कोई वहम नहीं है।
    अकेले आकर अकेले जाते हैं लोग।
    फिर भी 'हम' होने का अहम पालते हैं लोग ।।

    अमीरों को बड़प्पन का अहम है।
    गरीबों को फूटी किस्मत का वहम है।
    जिनमे समझदारी की सौगात है।
    उन्हें दोनों की नासमझी पर रहम है ।

    ताकतवर अहम में हाथ उठा जाते हैं।
    कमजोर वहम में मैदान छोड़ जाते हैं।
    हिम्मतवालों में जो होते हैं,
    दोनों की बुज़दिली पर सहम जाते हैं।

    हम में न तो अहम है, न ही वहम है,
    ये सोच रखना भी तो एक अहम है।
    हैं सही हर मायने में सिर्फ हम ही,
    ये मानने से भी बड़ा क्या कोई वहम है?